Saturday, 2 July 2011

फ़िल्म क्यों देखते है हम

काहे ना देखें? कोई मनाही है का? क्या आपको हमारे चाचाजी ने भेजा है हमे रोकने के लिये? बचपन मे तो चाचाजी ने भरसक प्रयास किये कि हम बच्चे सिनेमा हाल के आसपास भी ना फ़टकने पायें।जब कभी भी फ़िल्म के लिये जिद करते तो खूब डाँट पड़ती और ज्यादा पंगा लेते तो पिटाई होती।थोड़े दिनो के लिये तो जिद समाप्त होती।अब जहाँ डिमान्ड होती है तो वहाँ सप्लाई अपने आप आ जाती है, ये अर्थशास्त्र का नियम है…आचार्य जी तो यही बोलते थी, बाकी अब अर्थशास्त्री जाने। हाँ तो हम बता रहे थे, कि चाचाजी ने फ़िल्मे देखने पर रोक लगाई थी, स्टोरी सुनने पर थोड़े ही लगाई थी। हमारी बड़ी बहनों को ना जाने कहाँ से ये इन्नोवेटिव आइडिया आ गया कि फ़िल्म की स्टोरी सुनाने के लिये भी पैसे वसूले जा सकते है (जरुर बिल गेट जैसा दिमाग पाया होगा), तो भैया हम काफ़ी दिन तक तो उल्लू बनते रहे, यानि दीदी से स्टोरी सुनते रहे और अपनी जेबखर्च की गाढी कमाई उनके चरणों मे रखते रहे।वो इस पैसे से चूरन कैथा और इमली वगैरहा खरीदती थी।
रही बात स्टोरी की तो सीन बाइ सीन और फ़्रेम बाइ फ़्रेम सुनाई जाती थी, और बीच बीच मे हमारे फ़िजूल के सवालों (जैसे अगर हीरो का बाप मरकर जिन्दा हो गया, तो वो डैडबाडी किसकी थी? ये पेड़ों के पीछे से गाने के बीच मे कपड़े कैसे बदल जाते है, और दो फ़ूलों या कबूतरों के आपस मे चोंच लड़ाने का क्या मतलब होता है वगैरहा) के भी जवाब मिल जाते थे, अक्सर जवाब एक ही होता था “स्टोरी सुनना है कि जाय हम दूसरा काम देखें” अब हम पैसे तो एड्वान्स मे ही दे चुके होते थे, इसलिये मन मारकर निर्माता और निर्देशक को पचास गालियां देते हुए भी स्टोरी पूरी सुनते थे।अब बहनों की मोनोपली के आगे हम और कर भी क्या सकते थे, चाचाजी के गुस्से का तो सभी को पता ही था। लेकिन ज्यादा दिनो तक ऐसा नही चला, हमे भी एक ग्राहक मिल ही गया, वो था सुक्खी, हमने बस करना वो होता था। स्टोरी मे कुछ बद्लाव करने होते थे।सुक्खी बहुत अड़ियल था, बोलता था, सिर्फ़ वही स्टोरी सुनेगा जिसमे सरदार हो, मजबूरन हमे मसाला मूवी मे कभी हीरो तो कभी हिरोइन के बाप को सरदार बनाकर सुक्खी को तड़का मारकर स्टोरी सुना देते और अपने दीदी को दिये पैसे सुक्खी से वसूल लेते। अब क्या करें अपनी गाढी कमाई को ऐसे थोड़े ही जाने देते।और सुक्खी? यकीनन सुक्खी भी आगे ऐसा ही करता होगा।कुल मिलाकर एक अच्छा खासा बिजिनेस माडल था, जिसमे पूरी पूरी इआरपी इम्प्लीमेन्टेड थी। लेकिन सवाल तो वंही खड़ा रहा ना…कि हम फ़िल्मे क्यों देखते थे?
अरे भई मनोरंजन के लिये और क्या? अब भारत मे क्या है मनोरंजन के ज्यादा साधन तो है नही, लोग जब बच्चे पैदा करते करते और उन्हे पालते पालते बोर हो जाते है तो जस्ट फ़ार चेन्ज सिनेमा देख लेते है तो उसमे बुराई क्या है? अब क्या है जनता ज्यादा पढी लिखी तो है नही, इसलिये साहित्यिक चीजों पर ज्यादा जोर नही दिया जाता। इसलिये सलीमा (सिनेमा) देखा जाता है। अब हमने शोध किया तो पाया कि अलग अलग तरह के प्राणी अलग अलग कारणों से फ़िल्मे देखते है।
बऊवा टाइप के लोग: अब बऊवा टाइप के लोग तो बस ये देखने जाते है कि कब हॉट सीन आयेगा।स्टोरी है या नही उससे मतलब नही, भाषा का भी कोई बैरियर नही, बस गरम मसाला होना चाहिये।वो इसलिये सिनेमा देखते है कि हिरोइन और आइटम बम के लटके झटके,लहराव,झुकाव और जाने क्या दिखे। कई कैटेगरी के लोग तो इसी चक्कर मे मलयालम और तमिल सिनेमा भी देखते है, कि शायद अगले सीन मे हिरोइन कपड़े उतारें। कंही पानी वगैरहा दिख जाता है या हीरो की बहन( वो सिर्फ़ इसी काम के लिये होती है) विलेन से सामने आ जाय तो मन बल्ले बल्ले हो जाता है और उम्मीद बंधती है अब शायद मन की मुराद पूरी हो।अब कल्लू पहलवान को ही लें, पूरे पूरे तीस बार “राम तेरी गंगा मैली” देखी, बोलता था, साली(मंदाकिनी….डान भाई माफ़ करना अब ये आपका आइटम है) का कभी तो पल्लू पानी के बहाव मे बहेगा। लेकिन नही…नही बहा…अब पन्द्रह रुपये मे इससे ज्यादा क्या दिखेगा?
जवान लड़के लड़कियां : अगर अकेले गये तो हीरो/हिरोइन के स्टाइल को देखते है,सिगरेट,फ़ैशन और डान्स का नया ट्रेन्ड अगर दूसरे दोस्तों के साथ जाते है तो अपनी हैकड़ी झाड़ते रहते है (“मै तो अमरीका गया था, वहाँ इसी फ़िल्म की शूटिंग हो रही थी” या “इस फ़िल्म का निर्माता तो मेरा चाचा के साले के पड़ोसी का सगी बुआ का लड़का है”) और खुदा ना खास्ता कोई गर्ल फ़्रेन्ड साथ मे है तो तभी फ़िल्म देखते है जब किनारे वाली सीट ना मिले।
फ़ैमिली टाइप के लोग: वो फ़िल्म कहाँ देखते है, बस अगल बगल देखते रहते है कि कंही कोई उनकी माँ बहन को कोई छेड़ तो नही रहा। वो तो बस गानों का इन्तजार करते रहते है ताकि पान सिगरेट पीने बाहर जाय या फ़िर इन्टरवल का जब पापड़,समौसे वगैरहा अरैन्ज कर सकें।
लड़किया(बहुए टाइप) : वो कपड़ों और गहनों के नये डिजाइन देखती है। ताकि ननद,जिठानी और देवरानी से होड़ ले सकें। मैने दो लेडीज को बात करते सुना “बहन! फ़िल्म कैसी थी” जवाब ये : “बेकार फ़िल्म, मुझे तो नही पसन्द आयी, वही पुराने स्टाइल के ब्लाउज के डिजाइन, एक दो गाने थे, उसमे भी कपड़े मेकअप से मैच नही कर रहे थे, कोई नया स्टाइल तो दिखा नही” गोया कि कहानी, स्क्रीनप्ले,एक्टिंग वगैरहा गया तेल लेने।
छुट्टन टाइप के लोग : अपने छुट्टन मिंया तो बालीवुड के सबसे बड़े समीक्षक है, फ़िल्म चलेगी या नही, बाक्स आफ़िस की क्या रिपोर्ट रहेगी, या फ़िल्म कहाँ से मारी हुई है, ये सब इन्हे पता रहता है। सिनेमा तो इनकी जीवनशैली का एक हिस्सा है वो अब इसे चाहकर भी अलग नही कर सकते। भले ही मिर्जा हजार गालियाँ देता रहे।
बुजुर्ग औरते(सास टाइप): ये लोग इमोशन के लिये सिनेमा देखने जाती है। अगर कोई मार्मिक फ़िल्म है तो सबसे ज्यादा इनकी भीड़ होगी। हीरो बचपन मे गुम गया, या बाप मर गया, या घर बार जुआ मे हार गये…ऐसी फ़िल्मे इनको बहुत पसन्द आती है। अगर इमोशन नही…तो मजा नही। एक और कैटेगरी होती है, धार्मिक वाली, जय सन्तोषी माँ टाइप की फ़िल्मे इन्हे बहुत पसन्द आती है। मैने अपनी आंखों से देखा है लोगो ने सोलह सोलह बार फ़िल्मे देखकर अपने व्रत का उद्वयापन किया है।
सुकुल टाइप के लोग: इनको सिनेमा वगैरहा से कुछ लेना देना नही (सैलून/कवि सम्मेलन से तो फ़ुरसत मिले) ये तो बेचारे बच्चे को सिनेमाहाल के बाहर गोदी मे टहलाने के लिये जाते है, अन्दर कोई भी फ़िल्म चल रही हो, बाहर तो बस “लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा…” ही होता रहता है।अब एक से ज्यादा बच्चे हो तो, उनके झगड़े सलटाने मे ही तीन घन्टे निकल जाते है।तब तक श्रीमती जी आराम से सिनेमा का मजा लेती हैं। है कि नही शुकुल….कहो तो बता दें पिछली सिनेमा वाली बात? खैर छोड़ो
बच्चे: बेचारे बच्चे, उनके लिये फ़िल्मे बनती कहाँ है, एक चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसाइटी थी कभी वो भी कभी की भंग हो गयी शायद। सफ़ेद हाथी टाइप की पिक्चरे देखी थी कभी। बच्चों के लिये सिनेमा मे गानों का होना बहुत जरुरी है और मार-धाड़ और जानवरों की कलाकारियां हो तो कहना ही क्या?
कहते है, साहित्य समाज का दर्पण है, शायद कुछ हद तक सही है, लेकिन भारत के सिलसिले मे मै यह कहना चाहूँगा कि सिनेमा ही समाज का दर्पण है। रोजी रोटी की जद्दोजहद और जिन्दगी के सुख दुख के सागर मे गोते लगाने के बाद, एक सिनेमा ही तो लोगों को आसरा देता है और कुछ सपने दिखाता है। जहाँ सपने है वहाँ और जीने की चाहत, बस इसी चाहत मे सिनेमा देखे जाते है। बाकी अगर कोई ये कहता है सिनेमा से लोग शिक्षा लेते है, तो भैया मैने तो किसी को अच्छी शिक्षा लेते नही देखा। हाँ लड़कियों को छेड़ने की, प्रतिशोध,घ्रृणा और षड़यन्त्र की शिक्षा जरुर ली है लोगों ने। मै सिनेमा क्यों देखता हूँ, विदेश मे रहता हूँ ,देसी चीजों को देखने का हक है मेरा, सिर्फ़ बऊवा थोड़े ही देखेगा,हम भी है लाइन में।मनोरंजन का इससे अच्छा और सस्ता(अब कहाँ रहा सस्ता) साधन और कोई तो नही दिखता।फ़िर देसी सिनेमा देखकर अपने वतन की मिट्टी से भी तो जुड़ा रहता हूँ।

हिंदी के भविष्य में इंटरनेट की भूमिका

web_patrikayenइंटरनेट पर हिंदी अपनी उपस्थिति दर्ज़ कर चुकी है। यह सिद्ध हो चुका है कि हिंदी किसी भी उच्च-भ्रू तकनीक के अनुकूल है। हिंदी की वेबसाइटों की संख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है उसी अनुपात में इसके पाठकों की संख्या भी बढ़ रही है। लेकिन अभी हिंदी को नेट पर बहुत लंबा सफ़र तय करना है। इसके मार्ग में अनेक तकनीकी बाधाएँ हैं। इन बाधाओं के बारे में आगे बात करेंगे। पहले इस मिथक की बात करें जिसे हिंदी के प्रबुद्ध वर्ग तक ने अपने मन में बैठा रखा है। मिथक यह है कि इंटरनेट, शब्द और अंतत: किताब के लिए खतरा है। प्रबुद्ध वर्ग का इस उच्च-भ्रू तकनीक से अलगाव विचारधारात्मक उतना नहीं हैं, जितना कि इसके दाँव-पेंचों को न समझ पाने (जैसे आर्थिक या फिर तकनीकी जटिलताओं से अनुकूलन न कर पाना) के कारण है। अत: वे इससे एक दूरी बरतना ही पसंद करते हैं। इसलिए सबसे पहले इंटरनेट पर किताबों-पत्रिकाओं की संभावनाओं की बात की जाए।

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और पास आती जा रही है। वैश्विक ग्राम की अवधारणा के पीछे सूचना क्रांति की शक्ति है। इस प्रक्रिया में इंटरनेट की भूमिका असंदिग्ध है। जहाँ दुनिया भर में पाठकों की संख्या का ग्राफ़ नीचे आया है, वहीं सूचना क्रांति को किताब पर छाए ख़तरे के रूप में भी देखा जा रहा है। इलेक्ट्रानिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहाँ कथा और अ-कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकते हैं। इसका अर्थ है कि इंटरनेट पर कोई भी कृति इंटरनेट पाठक वर्ग के लिए डाउनलोड की जा सकती है। इससे वेब पीढ़ी के पाठक तो अनमोल साहित्य और वैचारिक पुस्तकों से जुड़ेंगे ही, साथ में पुस्तक के वर्तमान स्वरूप में एक नया आयाम भी जुड़ेगा। इस दिशा में प्रयास हुए भी हैं, उदाहरण के तौर पर माइक्रोफ़िल्म को सामने रखते हैं। ख़ास अर्थो में यह भी पुस्तक की परिभाषा में एक नया आयाम तो जोड़ती है, लेकिन महँगाई और जटिल तकनीक के कारण इसकी पहुँच सीमित है, जबकि इंटरनेट का फैलाव विश्वव्यापी है।
सही मायनों में किताब के व्यापक प्रसार की प्रक्रिया पंद्रहवी शताब्दी में प्रिटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद से ही आरंभ हुई थी। इसने ज्ञान पर कुछ विशिष्ट लोगों के एकाधिकार को तोड़ा और आम जन के लिए ज्ञान की नई दुनिया के द्वार खोले। अब यही काम इंटरनेट भी कर रहा है, लेकिन ज़्यादा तीव्रता से और व्यापक स्तर पर, इंटरनेट ने सूचना या ज्ञान पर एकाधिकार को तोड़ा और विकेंद्रित किया है। विश्वव्यापी संजाल (वर्ल्ड वाइड वेब जो संक्षेप में डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू. कहलाता है) के ज़रिए इंटरनेट उपयोगकर्ता दुनिया भर की कैसी भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार जो कार्य प्रिटिंग मशीन के आविष्कार से आरंभ हुआ था, उसे इंटरनेट ने विस्तार ही दिया है, अतिशय सूचना की समस्या और इस पर किसी एक ही व्यक्ति विशेष के वर्चस्व के प्रश्न को निश्चित ही अनदेखा नहीं किया जा सकता, इस ओर सावधान रहने की आवश्यकता है। जहाँ तक इंटरनेट पर साहित्यिक कृतियाँ उपलब्ध कराने की बात है, तो यह प्रकाशकों और साहित्यकारों की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। प्रारंभिक दौर में हम पीछे रह गए हैं।

इंटरनेट की उपयोगिता को सबसे पहले विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने ही समझा टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, नई दुनिया, इंडिया टुडे, आउटलुक जैसी पत्रिकाओं ने अपने इंटरनेट संस्करण निकालने आरंभ किए, इससे निश्चित ही इन पत्र-पत्रिकाओं की पाठक संख्या बढ़ी है। ‘द स्टेट आफ द साइबरनेशन’ पुस्तक के लेखक नील वैरट के अनुसार, इंटरनेट के संदर्भ में ‘पाठ’ को तीन भागों मे बाँटा जा सकता है।

तात्कालिक महत्व के समाचार-परक लेख, जैसे दैनिक समाचार पत्र।

पृष्ठभूमीय समाचार-परक लेख (बैकग्राउंडर), जिनकी उपयोगिता अपेक्षाकृत कम समयबद्ध होती है जैसे साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाएँ।
स्थायी महत्व का कथा और अ-कथा साहित्य, यानी किताबें।
इंटरनेट पर पूरी किताब उपलब्ध करवाना बाइट का खेल है। (बाइट : कंप्यूटर में डेटा सुरक्षित रखने की आधारभूत इकाई, जिसमें एक बाइट आठ बिट के बराबर होती है), अधिकांश समाचार-परक लेखों की शब्द संख्या एक हज़ार शब्दों से कम होती है, पत्रिकाओं में छपने वाले लेखों की पाँच हज़ार शब्दों से कम, पूरे समाचार-पत्र या किसी पत्रिका को कंप्यूटर पर डाउनलोड करने में औसतन चालीस से पचास हज़ार शब्द लग सकते हैं। पुस्तकें इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने में औसतन अस्सी हज़ार शब्द लगेंगे, यद्यपि यह संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक प्रतीत होती है, लेकिन पूर्णत: व्यवहार्य है। कंप्यूटर की भाषा में कहें तो बिना चित्रों की अस्सी हज़ार शब्दों वाली किताब में मात्र ०.५ मेगाबाइट खर्च होंगे।

पुस्तकों के पाठकों की संख्या में आई गिरावट के इस दौर में इंटरनेट हमें एक नया पाठक वर्ग पैदा करने का अवसर देता है। तकनीकी विकास के साथ किताब का स्वरूप भी बदला है। हम जिस रूप में किताब को आज पाते हैं वह पहले से ऐसी नहीं थी। लेकिन तब तक से लेकर अब तक उसके होने पर कोई विवाद नहीं रहा। हाँ। तकनीक का विरोध औद्योगिक क्रांति के समय से ही कमोबेश होता रहा है। विक्टोरियन इंग्लैंड में कवि और समाज सुधारक विलियम मौरिस एक समय प्रिंटिंग प्रेस के सख़्त विरोधी थे। उनकी नज़र में इससे किताब के सौंदर्य और भव्यता पर आँच पहुँचती थी। स्पष्टत: यह एक अभिजातवादी दृष्टिकोण है। हिंदी के रचनाकारों की समस्या है कि वह तकनीक का कोई सकारात्मक उपयोग प्राय: अपने लिए नहीं पाते। क्या यह स्थिति इसलिए है कि वें एक पिछड़े समाज के प्रतिनिधि हैं? किसी भी तकनीक के दो पहलू हुआ करते हैं। एक अच्छा तो दूसरा बुरा। बुरे का विरोध और अच्छे का अपने पक्ष में उपयोग ही उचित है, न कि कोरे विरोध के द्वारा स्वयं को इससे असंयुक्त कर लेना।

किताब का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने है, उसमें किताब की अपनी स्वायत्त सत्ता होती है और पाठक की स्वायत्तता के खिलाफ़ इसकी दख़लअंदाज़ी बहुत सीमित होती है। मगर ऐसा ही इंटरनेट उपयोगकर्ता के साथ भी है। वह जब चाहे तब कंप्यूटर का स्विच आफ़ कर सकता है। हाँ! यह अवश्य है कि लैप टॉप सरीखे महँगे कंप्यूटर का उपयोग नदी किनारे बैठकर कोई साहित्यिक कृति पढ़ने के लिए नहीं किया जा सकता। यह कंप्यूटर की सीमा भी है। लेकिन तकनीक सुलभ और सस्ती हो, तो भविष्य में कुछ भी संभव है।
इंटरनेट पर साहित्य उपलब्ध होने से कुछ विधा संबंधी परिवर्तन आना तय है। उदाहरण के लिए, जिस प्रकार पत्रकारिता के दबावों के चलते रिपोर्ताज, धारावाहिक लेखन सरीखी विधाएँ सामने आई, उसी तरह कुछ नवीन विधाएँ इंटरनेट पर जन्म ले सकती है। सचित्र लेखन, कार्टून जिसका एक रूप है, उसकी तर्ज़ पर एक्शन भरा लेखन सामने आ सकता है। फ़िल्म और साहित्य के बीच की कोई विधा विकसित हो सकती है। ऑन लाइन फ़रमाइशी लेखन की संभावना भी बनती है। इंटरनेट पर सहकारी यानी सामूहिक लेखन के प्रयास भी हो सकते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या इंटरनेट पर गंभीर साहित्य की रचना संभव है या फिर यह सिर्फ़ पॉपुलर साहित्य तक ही सिमट जाएगा, इस प्रश्न का उत्तर भविष्य ही दे सकता है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इंटरनेट स्वयं संप्रेषण माध्यम की अंतिम कड़ी नहीं हैं।

वैज्ञानिक खोजें किसी एक बिंदु पर आकर नहीं रुकतीं, टेलीप्रिंटर के आने से संप्रेषण माध्यम में एक नया आयाम जुड़ा और बाद में यह रेडियो के विकास की कड़ी बना। हालाँकि अपने स्वतंत्र रूप में टेलीप्रिंटर आज भी बना हुआ है। इतिहास बताता है कि मशीन पर किताब छपने से क्लासिक की परिभाषा और किताब का स्वरूप, दोनों ही बदले हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध होने वाले साहित्य को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। कुल मिलाकर इंटरनेट-साहित्य किताब की परिभाषा में कुछ नया ही जोड़ता है।

बहुत कठिन है डगर पनघट की

जब तक इंटरनेट सेवा मुफ़्त ही न हो जाए, हिंदी पट्टी तक इसका पर्याप्त विस्तार हो सकेगा, इसमें शक है। हिंदी को तकनीक सचेत बनाने में बहुत सारी समस्याएँ हैं। इन समस्याओं का हल निकाले बिना हिंदी को इंटरनेट पर लाने के अब तक के तमाम प्रयासों समेत भविष्य के भी समाप्त प्रयास प्रभावकारी नहीं हो सकेंगे।

हिंदी में फोंट को ज़बरदस्त समस्या है। हिंदी के सैंकड़ों फोंट उपलब्ध हैं। और यही समस्या की असली जड़ है। अंग्रेज़ी के ‘टाइम्स न्यू रोमन’ की तरह हिंदी में कोई ‘वैश्विक फोंट’ नहीं है कि सभी हिंदी भाषी एक ही फोंट पर काम कर सकें। हर पत्रिका, हर अख़बार और हर प्रकाशक अपना एक नया ही फोंट चलाता है। इस तरह से हिंदी में फोंट को लेकर अराजकता की स्थिति बनी हुई है। इसी कारण हिंदी में कोई एक जैसा की-बोर्ड (कुंजीपटल) नहीं हैं। हालाँकि बाज़ार में की-बोर्ड पर चिपकाने वाले स्टिकर मिलते हैं। लेकिन जिन लोगों को व्यावसायिक मांगों के चलते एक से अधिक फोंट पर काम करना पड़ता है उनके लिए ये स्टिकर किसी काम के नहीं होते, यह हिंदी की व्यावसायिक दुर्बलता है। इस मायने में यह हिंदी वालों की विलक्षण मेधा ही है कि वे अंग्रेजी के की-बोर्ड पर हिंदी की टाइपिंग कर लेते हैं। इससे सिद्ध होता है कि हिंदी वाले तमाम मुश्किलों के बावजूद तकनीक सचेत बने हैं। इंटरनेट उपयोगिता हिंदी-प्रेमी होने के कारण हिंदी की वेबसाइटों पर जाते तो हैं। लेकिन हिंदी में ‘सबके लिए फोंट’ न होने कारण टिकते नहीं। वेबदुनिया सरीखी प्रसिद्ध वेबसाइट के ‘चैट सिस्टम’ के असफल होने का यही कारण है। अपना समय, ऊर्जा और पैसा खर्च करके इंटरनेट सर्फिंग करने वाले उपयोगकर्ताओं से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे हिंदी के दुनिया भर के फोंट सीखते फिरेंगे। इन फोंटों से परिचित न होने की स्थिति में इंटरनेट उपयोगकर्ता को लगता है कि वह अपना समय और पैसा बर्बाद कर रहा है। इसी कारण हिंदी में ई-मेल भेजने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति या तो इंटरनेट पर जाता ही नहीं या फिर अंतत: अंग्रेज़ी में ही ई-मेल करता है।

दरअसल की-बोर्ड की मैपींग (एक ऐसी मानक तालिका निर्धारित करना, जिसमें प्रत्येक अक्षर, अंक और चिह्न के लिए तयशुदा मानक ‘को’ हों) के मूल में ही फोंट की समस्या विद्यमान है। अंग्रेज़ी में भले ही फोंट अलग-अलग (टाइम्स न्यू रोमन, एरियल) हैं, लेकिन उन सबका की-बोर्ड एक ही है। असल में हिंदी का की-बोर्ड बनाते समय कोई मानक निर्धारित नहीं किया गया। अंग्रेज़ी में आई.बी.एम. को छोड़कर सभी कंप्यूटरों में ए.एस.सी.आई.आई. मानक का निर्धारण और पालन किया गया। इस तरह से बड़ी समस्या पहले ही सुलझा ली गई। इससे हुआ यह कि आप फोंट कोई भी इस्तेमाल करें, की-बोर्ड एक ही रहेगा। हिंदी की तरह नहीं कि कृतिदेव फोंट में अंग्रेज़ी के की-बोर्ड का ‘डी’ दबाने से ‘क’ आएगा और शुषा फोंट चुनने पर ‘द’, इसलिए की-बोर्ड का मानक निर्धारित करना आवश्यक है। यह तकनीकी समस्या है, लेकिन इससे इंटरनेट पर ही नहीं, कुल कंप्यूटर परिदृश्य पर हिंदी का भविष्य निर्भर करता है। हिंदी जानने वाले कंप्यूटर पर हिंदी को बहुतायत में तभी अपना सकेंगे जब यह बाधा दूर हो जाए। इस समस्या को सुलझाना निजी उद्यम के बस की बात नहीं हैं। बहुत सारे निजी प्रयास होने और कोई तयशुदा मानक न होने के चलते ही अराजकता की स्थिति बनी है। सरकार को इस दिशा में पहल करनी होगी। एक मानक की-बोर्ड बन जाने और एक नियम या कानून के तहत अनिवार्य होने से ही यह बाधा दूर हो सकती है।

दूसरी बिकट समस्या यू.आर.एल.ऐड्रस की है। जब तक यू.आर.एल. ऐड्रस और इंटरनेट संबंधी अन्य तकनीकी चीजें हिंदी में नहीं होंगी, तब तक अंग्रेजी न जानने वाले बहुसंख्यक हिंदीभाषी इससे नहीं जुड़ेंगे। इस प्रकार के इंटरनेट उपयोगकर्ता भविष्य में सर्वाधिक लाभ देने वाले सिद्ध हो सकते हैं।

तीसरी बड़ी समस्या इंटरनेट पर कोई ‘इच्छित जानकारी खोजने’ से संबंधित है। इंटरनेट का एक बड़ा ही दिलचस्प आयाम ‘सर्च इंजन’ हैं। सर्च इंजन की सहायता से इंटरनेट उपयोगकर्ता बड़ी आसानी से कैसी भी वांछित जानकारी जुटा लेता है। विडंबना बस यही है कि सूचना क्रांति के दूसरे दौर में प्रवेश हो जाने के बावजूद हिंदी में एक भी सर्च इंजन नहीं हैं। इंटरनेट पर लगभग सभी जानकारियाँ चूँकि अंग्रेज़ी में हैं, इसलिए सर्च इंजन भी अंग्रेज़ी में ही हैं। अंग्रेज़ी भाषा न जानने वाले के लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं हैं। कहना न होगा कि हिंदी पट्टी को सूचना क्रांति के पूरे लाभ नहीं मिले हैं। इस मायने में पहले से पिछड़ी हिंदी पट्टी और पीछे जा रही है। जबतक हिंदी का अपना विशाल डेटाबेस नहीं बन जाता, तब तक सर्च इंजन में अनुवाद की सुविधा देने वाले सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया जा सकता है। भाषा भले ही सहज, प्रवाहपूर्ण न हो, लेकिन अंग्रेज़ी न जानने वाला कम से कम अपनी भाषा में जानकारी तो जुटा सकेगा, इस दिशा में कापीराइट की समस्या आड़े आ सकती है, तो एक सुझाव यह हो सकता है कि इस तरह की साइट के लिए कुछ पैसा लिए जाने का प्रावधान कर लिया जाए, हालाँकि यह कोई बहुत कारगर उपाय प्रतीत नहीं होता है, क्यों कि इंटरनेट पर पैसा उपयोगकर्ताओं से न लेकर विज्ञापनदाताओं से लिया जाता है। बिल्कुल टी.वी. की तरह, जिसमे टी.वी. चैनल दर्शक से पैसा नहीं माँग सकते, ऐसा न करने से फ्लाप तक हो सकता है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इस दिशा में उस कंपनी को प्रयास करने होंगे जो हिंदी का सर्च इंजन उपलब्ध कराएगी, यह लचीली, कार्यक्षम और आक्रमक विपणन नीति से ही संभव हो सकता है। टी.वी. की ही तरह जितने अधिक साइट देखने वाले होंगे उतने ही विज्ञापन भी जुटाए जा सकेंगे।

चौथी बड़ी समस्या स्वयं हिंदी की वेबसाइटों को लेकर है। हिंदी की इन वेबसाइटों पर ग़ौर करें तो ख़ासे दिलचस्प परिणाम सामने आते हैं। इन वेबसाइटों की खोज-खबर लेकर, अंग्रेज़ी की वेबसाइटों से तुलना करने पर पता चलता है कि हिंदी की वेबसाइटें दरअसल कितनी पिछड़ी या बेहतर काम कर रही हैं। इंटरनेट पर मुख्यत: पाँच प्रकार की वेबसाइटें उपलब्ध हैं।

वेबदुनिया सरीखी वेबसाइटें, जिन्हें अंग्रेज़ी के इंडिया टाइम्स की प्रतिकृति कहा जा सकता है, वेबदुनिया ने हिंदी की अन्य वेबसाइटों की तुलना में स्वयं को अधिक बाज़ार सचेत सिद्ध किया है। इसमें भी वे सभी हथकंड़े अपनाए जाते हैं, जिन्हें इंडियाटाइम्स एक लंबे समय से अपनाता रहा है। इसकी सबसे बड़ी कमी यही है कि इसके पास इंडिया टाइम्स की तरह सर्च इंजन नहीं है। सकारात्मक पक्ष वही है कि इसमें साहित्य और विचार के लिए भी जगह है
अप्रवासी भारतीयों और भारत में ही निवास करने वाले लोगों की निजी वेबसाइटें, इन वेबसाइटों से हिंदी प्रेम तो झलकता है, लेकिन स्तरीयता की कमी रहती है। इन वेबसाइटों पर जाना अपना समय और पैसा नष्ट करना है, लेकिन कुछ बेहतर पयास भी दिखते हैं, लोग निजी स्तर पर अपने पसंदीदा रचनाकार/रचनाकारों की रचनाएँ वेबसाइट बनाकर उपलब्ध कराते हैं|

ग़ैर सरकारी संगठनों, विदेशी विश्वविद्यालयों और स्वामियों या मठाधीशों की वेबसाइटें चूँकि एक ख़ास उद्देश्य को लेकर ही बनाई जाती है, इसलिए इनका पाठक वर्ग भी विशिष्ट या अलग प्रकार का होता है। सरकारी वेबसाइटों को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन सरकार की महिमा ही है कि हिंदी के राष्ट्रभाषा होने के बावजूद, सरकारी वेबसाइटों पर उपलब्ध अधिकांश जानकारियाँ अंग्रेज़ी में ही हैं। इससे ‘सबको सूचना के अधिकार’ की खिल्ली ही उड़ती लगती है। सरकार ऐसी भाषा में जानकरी दे रही है, जिसे बहुसंख्यक जनता समझती ही नहीं है। देसी शिक्षा संस्थानों की साइटों पर भी अंग्रेज़ी का ज़ोर है।
पत्रिकाओं (साहित्यिक और गैर साहित्यिक), अखबारों, टीवी चैनलों और सिनेमा संबंधी वेबसाइटों को यहाँ रखा जा सकता है। पत्रिकाओं, अख़बारों और टीवी चैनलों की स्थिति फिर भी ठीक है, लेकिन जिन्हें सिनेमा पर कुछ भी स्तरीय पढ़ने की आदत हैं, उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी।

उपरोक्त श्रेणी की अधिकांश वेबसाइटें इस कदर जानकारी विहीन है कि उन्हें देखने का कोई तुक नहीं बनता है। कहना न होगा कि हिंदी को इंटरनेट पर अभी बहुत सफ़र तय करना है। साहित्यिक पत्रिकाओं और किताबों को हिंदी में इंटरनेट पर उपलब्ध करने को लेकर बहुत से बुद्धिजीवी सवाल खड़े करते रहे हैं। उनसे यही कहा जा सकता है कि आज हम जिस रूप में किताब को जानते हैं वह हमेशा से ऐसी नहीं थी। इसलिए रूप बदलने को न तो शब्द की मृत्यु मानना उचित है और नही ‘फार्म’ को लेकर रूपवादी होना ही ठीक है। भारत सरीखे बहुस्तरीय समाज में, छपे हुए शब्द की महत्ता कम नहीं होने वाली। इसलिए दोनों मोर्चों पर एक साथ लोहा लेने की ज़रूरत है।

भूमंडलीकरण के औज़ार, बाज़ार और मीडिया ने न सिर्फ़ हिंदी को, बल्कि अपनी देहरी तक सीमित अन्य भाषाओं को भी विस्तार दिया है। प्रौद्योगिकी ने इसे आसान बनाया है। एक बार फिर भाषा निर्णायक रूप से बदल रही है। हम एक ऐसे ‘संक्रमण बिंदु’ पर खड़े हैं, जहाँ से हमें भाषा की ताक़त और कमज़ोरियों के सवाल से भी दो-चार होना होगा। मीडिया में हिंदी के बढ़ावे को देखकर जो लोग खुश हो रहे हैं, उन्होंने स्थिति पर गहराई से विचार ही नहीं किया है। इसका अर्थ है, जनता को लगातार एक ऐसी भाषा में बनाए रखना, जिसमें ज्ञान नहीं, दैनिक सूचनाएँ ही अधिक हों, ज्ञान का केंद्रीकरण इस मायने में अंग्रेज़ी भाषा के पक्ष में और अधिक हुआ है। हिंदी में आज आप कोई भी स्थायी या अस्थायी महत्व को वैश्विक जानकारी इंटरनेट पर नहीं जुटा पाएँगे। मगर हिंदी को तकनीक सचेत बनाने में जो तकनीकी दिक़्क़तें हैं, उन्हें दूर किए बिना इंटरनेट पर हिंदी की सफलता को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इन सब बातों का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि तमाम तकनीकी दिक़्क़तों के बावजूद हिंदी की बेहतर वेबसाइटें नहीं आ रही हैं। इसका उद्देश्य तो बस पाठकों को वस्तुस्थिति से परिचित कराना है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इंटरनेट पर ऐसी वेबसाइटें बहुतायत में हैं जो हिंदी के ई-पाठक के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है। ज़रूरत है बस इन वेबसाइटों के बारे में जानकारी की।

किशोरवास्था में रिश्तों का महत्व

रिश्तों का महत्व इस दुनिया में हमारे आगमन के साथ ही शुरू हो जाता है। माता, पिता, भाई, बहन, दोस्त सभी से रिश्ते हमारे लिए खास महत्पूर्ण होते हैं और उनका अपना-अपना महत्व हमारे लिए होता है। लेकिन प्यार एक ऎसा रिश्ता होता है जिसे हम स्वयं चुनते हैं। प्यार की उमंगे किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही अंगडाई लेने लग जाती है। यह वह अवस्था है जिसके दौरान शरीर और हार्मोन्स में परिवर्तन होता है। इसके कारण किशोरवास्था में ऑपोजिट सेक्स के प्रति रूझान बढ जाता है। आपको उसका साथ अच्छा लगने लगता है। आप उसके बारे में और ज्यादा जानना चाहते हैं / चाहती हैं, तो समझिए आप अपनी खोज के नजदीक हैं।

stars दोनों को एक-दूसरे को समझने के लिए आपसी तालमेल एवं मुलाकात करना चाहिए।
stars अपने साथी के साथ तारतम्यता समझनी चाहिए।
stars एक दूसरे से मिलने और बातें करने पर दोनों में बहुत सी बाते सामने आती है।
stars एक दूसरे की भावनाओं को समझने की कोशिश करें।
stars शांति से बैठकर अपने साथी की बातों को घ्यान से सुने, उन्हें समझने की कोशिश करें।

किशोरावस्था में इतनी समझ नहीं होती कि आपके लिए कौन और क्या सही है और क्या गलत। आपके रिश्ते में प्यार है या सिर्फ आकर्षण मात्र। पहले अपने रिश्ते को समझें फिर कोई कदम उठाएं। आपके रिश्ते में प्यार है या सिर्फ आकर्षण । इनका जवाब आप स्वयं से पूछ सकते हैं।
stars क्या आप एक दूसरे की बातों को घ्यान से सुनते हैं जब आप कुछ कहते है ?
stars क्या आप एक दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करते है ?
stars क्या आप एक दूसरे के प्रति प्यार जताते हैं|
stars क्या आप अपने साथी के प्रति विश्वास और वफादारी रखते है ?
stars क्या आप एक दूसरे से किया वादा निभाते है ?
stars क्या आप एक दूसरे की भावनाओं को समझते हैं, उनकी कद्र करते है ?
stars क्या आप एक दूसरे के साथ अपने को सहज और सुरक्षित महसूस करते हैं ?
stars क्या एक दूसरे से मिलने पर खुशी होती हैं ?
stars क्या आप अपने साथी पर गर्व महसूस करते हैं ?
stars क्या आपको अपने साथी के दोस्तों से मिलने पर जलन होती हैं ?

क्या आप लड़की को प्रपोज करना चाहते हैं

love_praposeअक्सर लड़के लड़की को प्रपोज करने में हिचकिचाते हैं। तब उनके मन में अजीब से डर पैदा हो जाते हैं, आप जब किसी लड़की को प्रपोज करते हैं, तो आपके मन में बहुत से नेगेटिव (negative) विचार आते हैं। जैसे कहीं वह डांट न दे या फिर थप्पड़ न मार दे। लेकिन ध्यान रखें कि लड़की तब तक गलत व्यवहार नहीं करेगी, जब तक आप उसके साथ तमीज से पेश आएंगे। अपने मन से सारा डर निकाल दें और उसे प्रपोज (propose) करें। जो लोग ऐसा करते हैं, वही चैंपियन बनते हैं।

कई लड़के सोचते हैं कि उन्होंने लड़की को इंप्रेस तो कर ही लिया है और इसके बाद लड़की पहल करेगी। अगर आप भी यही सोच कर बैठे हैं, तो यह आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है। वह आपको पसंद करती भी होगी, तो भी पहल नहीं करेगी। आपको जब भी मौका मिले, आप लड़की से अपने दिल की बात कह दें। आप प्रपोज करने में देर न करें। लड़की का दोस्त बनने या फिर उसकी तरफ से पहल करने की उम्मीद करना बेकार है।


आप लड़की के फ्रेंड सर्कल में शामिल हों और उसके दोस्तों से बात करें। लड़की उन लड़कों बेहद पसंद करती हैं, जो उसके दोस्तों के साथ हर सब्जेक्ट पर बात करते हैं। अगर वह आप से किसी सब्जेक्ट पर इन्फॉर्मेशन (information) चाहती है, तो इसी बहाने आप उसका मोबाइल नंबर ले सकते हैं। आप हर सब्जेक्ट पर खुल कर बात करें, ताकि वह आपसे इंप्रेस हो जाए। आप लड़की को प्रपोज करना चाहते हैं, लेकिन उसे देखते ही आपकी बोलती बंद हो जाती है। इसका मतलब है कि आप उसे चाहते हैं। हम जिसे पसंद करते हैं, उसे खोने के डर से हम घबरा जाते हैं और हमारा कॉन्फिडेंस लेवल (confidence Level)  कम हो जाता है।


आप लड़की को फ्लर्ट या फिर टाइम पास सोचकर प्रपोज न करें। अगर आप वाकई सीरियस होंगे, तो यह बात आपके चेहरे व शब्दों में साफ दिखेगी। उसके साथ सेक्सुअल कम्यूनिकेशन (sexual communication)शुरू करना चाहते हैं और चाहते हैं कि वह भी आपमें 'इस तरह' दिलचस्पी ले। अगर वह आपको टच करती है, तो आप उससे कहें, 'तुम मुझे आजकल बहुत टच करने लगी हो या तुमने कौन-सा परफ्यूम लगाया है। उसकी खुशबू बहुत अच्छी है।' आप उसके साथ बॉयफ्रेंड की तरह ट्रीट न करें, मसलन उसे फूल, चॉकलेट वगैरह न दें। ऐसा करके आप अपनी जल्दबाजी जाहिर करेंगे, जिससे आपका काम बिगड़ेगा।


आप पहली बार डेट पर जा रहे हैं या फिर पहली बार किस कर रहे हैं, तो यह आप दोनों के लिए ही बहुत बड़ी बात है। अगर आप उसे डेट पर ले जाते हैं, तो उससे प्यार से पूछें कि क्या वह आपके साथ मूवी (movie) देखना पसंद करेगी। लड़कियां उन लड़कों की कंपनी बहुत पसंद करती हैं, जो फन लविंग होते हैं। यह लड़कियां अच्छी तरह से जानती हैं कि हर लड़का उन्हें सेक्सुअली अप्रोच करना चाहता है। ऐसे में यह लड़के के गट्स पर डिपेंड करता है कि वह लड़की को कैसे इंप्रेस करता है। अगर लड़की अपनी फ्रेंड के बॉयफ्रेंड के बारे में बताती है कि उसने उसके साथ सेक्सुअली कम्यूनिकेट किया है, तो आप इस कंडीशन में लड़के के गट्स (guts) की तारीफ करें।


आप किसी लड़की को पसंद करते हैं, लेकिन आपको लगता है कि उसका बॉयफ्रेंड है या वह किसी सीरियस रिलेशनशिप (Serious Relationship) में है और आप उसे प्रपोज नहीं करते हैं। आप खुद ही मन में कोई धारणा न बनाएं। हो सकता है कि आप जैसा सोच रहे हैं, ऐसा बिल्कुल न हो। अगर वह पहले से ही एंगेज है, तो वह आपको मना कर देगी। लेकिन ऐसे में आपको यह पछतावा तो नहीं रहेगा कि आपने उससे पूछा नहीं। अक्सर लड़के सोचते हैं कि मैं उस लड़की के टाइप का नहीं हूं, क्योंकि लड़कियों को हमेशा डॉमिनेटिंग, वेल-ग्रूम्ड और फनी (Funny) लड़के पसंद होते हैं। अगर आप थोड़ी कोशिश करेंगे, तो आसानी से ऐसे बन सकते हैं। इसलिए अपने मन में ऐसे विचार न लाएं कि आप उसके लायक नहीं है।

Wednesday, 29 June 2011

दोस्ती के कुछ उसूल

दोस्ती(Friendship) का धागा बहुत ही नाजुक होता है. जरा सा भार पड़ा नहीं कि अच्छे अच्छे बिछुड़ जाते है. बचपन की दोस्ती को ही ले लीजिए. मैंने और आपने कितने दोस्तों से हमेशा साथ रहने की बात की थी लेकिन क्या अब वह सभी दोस्त(Friend) साथ हैं, नहीं ना. कहां गए वह दोस्त क्या किसी भीड़ में खो गए है या हमसे बहुत दूर चले गए. बचपन(Childhood) में दोस्त तो बहुत जल्दी बन जाते थे पर अब दोस्त बनाने थोड़ा मुश्किल हो गया है. और दोस्त बनाने के बाद भी आराम नही मिलता दोस्ती आगे बढ़ाने के लिए भी काफी बेलन बेलने पड़ते है. आइयें कुछेक ट्रिक और टिप्स(Tips) के जरिए दोस्ती के जोड़ में फेविकॉल का दम लगाएं.



दोस्तऑनेस्टी(Honesty)





दोस्ती में ऑनेस्टी सबसे बड़ा मूल्य है। यदि फ्रैंडशिप (Friendship) में ऑनेस्टी होगी तो यह ज्यादा मजबूत होगी। कई बार देखा गया है कि ऑनेस्टी न होने के कारण ही कॉलेजेस में कई अच्छी दोस्ती टूट जाती हैं और जिंदगी में हमेशा के लिए एक कड़वा स्वाद दे जाती है। कई स्टूडेंट इस अनुभव को जिंदगीभर नहीं भूल पाते हैं। इसलिए अपने दोस्त के प्रति ईमानदार रहें।





लव एंड केयर(Love and Care)





दोस्ती में प्यार-मोहब्बत(Love and Relationshi) न हो तो मजा ही क्या है। लेकिन प्यार-मोहब्बत का मतलब किसी तरह का स्वार्थ नहीं होता। यह किसी मतलब से नहीं की जाती और न ही इसके जरिए कोई मतलब हासिल किया जाता है। इसमें तो एक-दूसरे के प्रति लव एंड केयर(Love and Care) की भावना होती है। एक-दूसरे का ध्यान रखा जाता है, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद का ध्यान रखा जाता है।



अंडरस्टैंडिंग





यदि प्यार-मोहब्बत(Love)  हो और अंडरस्टैंडिंग न हो तो भी बात नहीं बनती। कई बार दोस्तों में दरार आ जाती है और दोस्ती टूट जाती है। इसका एक बड़ा कारण होता है अंडरस्टैंडिंग की कमी। यदि दो दोस्तों के बीच बेहतर अंडरस्टैंडिंग होगी तो यह ज्यादा मजबूत होगी। अपने दोस्त को बेहतर ढंग से जानने-समझने की कोशिश करेंगे, तो गलतफहमियाँ पैदा नहीं होंगी।





रिस्पेक्ट





कई बार मौज और मस्ती के मूड में, जोश और जुनून में दोस्त अपने दोस्तों से ऐसी मजाक कर बैठते हैं, जो उन्हें नागवार गुजरता है। उन्हें इंसल्टिंग फील होता है। इसलिए यह ध्यान रखें कि आपका कितना भी अच्छा फ्रैंड हो, आपके कितने भी बेतकल्लुफ रिश्ते हों लेकिन वह आपसे चाहता है कि आप उसका रिस्पेक्ट करें। अक्सर दोस्त यह भूल जाते हैं। दोस्तों का रिस्पेक्ट करें।

तो समझो प्यार हो गया

प्यार के रोगी तो सभी होते हैं, शायद आप भी प्यार के रोगी हैं, लेकिन कई बार आप इस रोग को पकड़ नहीं पाते हैं. कई बार सोचते-सोचते ही सारा टाइम निकल जाता है. जब तक समझ आता है कि यह प्यार है तब तक देर हो चुकी होती है. कहीं आप भी इसी इंतजार का रोना तो नहीं रो रहे. तो चलिए जानिए अपने प्यार के लक्षण को…




अगर नीचे लिखी बातें सच हैं यानि इनका जवाब सही है तो आप प्यार की बॉल पर आउट हो गए हैं.

Valentine's day अगर आप पहले से अच्छा महसूस करते हैं. एक अच्छा रिश्ता आपको अपने बारे में अच्छा महसूस कराता है.

आप अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ समय गुजारने के मौक़े ढूंढ़ते हैं.

आप छोटे-छोटे पलों का भी आनंद उठाने की मौका कभी भी नहीं गंवाते हैं.

आप अपने साथी का सम्मान करते हैं. जैसे पत्नी अपने पति के बारे में इस तरह की बातें कहती हैं, ‘मेरे पति कमाल के गायक हैं.’

आप इस बात में दिलचस्पी लेते हैं कि आपका साथी क्या सोचता है. आप अपने लिए अहम मुद्दों पर साथी की राय चाहते हैं और उसकी असहमति का बुरा नहीं मानते.

आपको साथी की चतुराई से कोई दि़क्क़त नहीं होती. आख़िर हर कोई चतुर बनता है, आप भी. आप अपने संबंधों में आ रही मुश्किलों से निबटने में सक्षम हैं. स्वस्थ संबंधों में लोग साथी की असहमति को उसके बारे में ज्यादा जानने को मौक़ा मानते हैं.

अपने साथी की तुलना औरों से नहीं करते. आपके साथी से सुंदर, बुद्धिमान और पैसे वाले लोग भी होंगे, पर आपको परवाह नहीं, क्योंकि आप तो सिर्फ़ अपने साथी का साथ चाहते हैं.

वैसे आजकल के मॉडर्न टाइप आशिकों को भी कई बार प्यार को समझने में देर होती है तो आइए जनाब आप भी जान लें कहीं आपको प्यार तो नहीं.

अगर अचानक आपका संगीत का टेस्ट बदल गया हो, विरह गीत से आप सीधे-सीधे डुएट पर उतर आए हों.

आपको माँ के हाथ की बनी रोटियों में भी उसका चेहरा नज़र आता हो.

रात करवटें बदल-बदल कर कटती हों.

सारा दिन उसके ख्यालों मे बीतता हो.

जब घर वाले कहने लगें, आप ऊंचा सुनने लगे हो.

जब आप उसके घर पर बार-बार फोन करके काटने में पारंगत हो चुके हों.

मोबाइल का बिल दस गुना बढ गया हो.

आप इंटरनेट पर प्यार मोहब्बत वाले एसएमएस ढूंढने लगे हो.

रात को सोने से पहले और जागने के बाद सबसे पहले उसी से मिलने का मन करे.

अपने आप को शीशे में देखने की संख्या में वृद्धि हो गई हो.

अगर आपको ऊपर लिखी कुछ बातें अपने व्यक्तितव में आजकल नजर आने लगी हैं तो मुन्ना आप प्रेम रोग के शिकार हो चुके हैं. जाइए और अपना इलाज करवाइए

लड़के - पहेली से कम नहीं.

इश्क मुहब्बत तो सब करते हैं!
गम – ऐ – जुदाई से सब डरते हैं
हम तो न इश्क करते हैं न मुहब्बत!
हम तो बस आपकी एक मुस्कुराहट पाने के लिए तरसते हैं!



कई बार हम सोचते हैं कि लड़कियों को पटाना ही मुश्किल होता है, सभी मुश्किलें लड़कियों को सेट करने में ही होती है लेकिन यार कभी यह भी तो सोचो कि लड़कियां भी उसी तरह लड़को को पटाने या किसी के प्रेम में पागल होती होंगी.


आज के इस अंश में मैं लड़कियों के लिए ही कुछ प्रेम टिप्स दे रहा हूं, लेकिन यह टिप्स इंटरनेट से ली है लेकिन अंदाज मेरा अपना है और साथ में एक लड़का होने के साथ मेरे अनुभव भी हैं.


love_storyसपनों का राजकुमार


हर लड़की का सपना होता है कि उसका प्रेमी या साथी ऐसा हो जिसे उसने सपनों के राजकुमार जैसा देखा हो. अपने लवर में वो उस राज कुमार की छवि ढूंढने की कोशिश करती है लेकिन उसके व्यक्तित्व के कई अनछुए और अनजाने पहलू ऐसे भी होते हैं जो उसके सपनों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं जिन्हें वह नहीं जान पाती.


यार लड़कों का बिहेवियर यानी व्यवहार और उनके सोचने का तरीका बिलकुल अलग होता है. इसलिए आपको अपने दोस्त से इस बात की उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह बिल्कुल बदलकर आपकी तरह हो जाएगा. आपको उसे बदलने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए.


लड़कों के लिए भी प्यार एक बहुत ही नाजुक अहसास होता है. ऐसा नहीं होता कि हर लड़का प्लेयबॉय हो या फ्लर्ट करने में ज्यादा इंट्रेस्टेड  हो. कुछ लड़कों का दिल लड़कियों की तरह ही नाजुक होता है, उन्हें भी प्यार में उसी सम्मान और विश्वास की चाह होती है जैसा लड़कियां चाहती हैं.


beautiful-scene-समय की पाबंदी


प्यार में समय व्यतीत करना लड़कों के किस्मत में ही लिखा होता है. अक्सर लड़कियों का आरोप होता है कि वक्त के साथ लड़कों का प्यार कम होने लगता है. यार जरा आप (लड़कियां) भी तो सोचो कि क्या लड़के हमेशा खाली रहते है. वक्त बीतने पर जब सामंजस्य बढ़ जाता हैं तब ये उम्मीद कम कर देना चाहिए कि एक प्रेम पत्र के साथ वो रोज सुबह फूलों का गुलदस्ता आपके दरवाजे पर रख कर जाएगा, या फिर पहले की तरह सुबह शाम-फोन पर घंटों बातें किया करेगा. वह दो-तीन दिनों तक आपको फोन ना कर पाए, तो आपको अपनी नाराजगी दिखाते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह उसके किसी व्यवहार से आपको दुख पहुंचता है, उसी तरह आपकी भी कुछ बातें उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती हैं.


तारीफ जरुरी है सनम


इसी तरह लड़कियों को यह चीज भी बहुत हर्ट करती है कि लड़के समय बीतने के बाद उनकी तारीफ करनी भी बंद कर देते हैं लेकिन वही लड़कियां न जाने यह क्यों भूल जाती हैं कि वह भी तो लड़कों को नजरअदांज करती हैं. तारीफ सुनना हर व्यक्ति को अच्छा लगता है, लेकिन नारी जैसी निर्मलता पुरुषों में कम होती है. हो सकता है वो आपकी उम्मीद पर पूरी तरह नहीं उतर पाएं, या अपनी भावनाओं को शब्दों में ना ढाल पाएं. आपके किसी तोहफे पर धन्यवाद जैसे औपचारिक शब्दो की उम्मीद रखने की बजाय उसकी आंखों में उतर आयी प्रसन्नता को देखने की कोशिश करें.


लव और सेक्स की पहेली


प्रेम को तो ऋषि मुनियों ने भी पवित्र माना हैं, दैहिक आकर्षण तो एक प्राकृतिक लक्षण हैं जिससे कोई भी परे नहीं रह पाया है. हमारे समाज में कुछ नियमों को संस्कार का रूप दिया है जिसे कई बार युवा वर्ग अपनाने से मना कर देते हैं इसका मतलब ये नहीं कि वो सिर्फ आपसे शारीरिक आकर्षण से जुडा है. यदि आप इन नियमों का पालन करना चाहती हैं तो आप पर निर्भर करता है कि नाराज़ होने या उसका तिरस्कार करने की बजाय प्रेम से समझा पाती हैं या नहीं , दैहिक संबंध से परे एक और चीज़ बहुत महत्वपूर्ण होती है वो है स्पर्श जो उसे प्रियतमा के दैहिक आकर्षण से परे अपनत्व का एहसास दिलाएगा.


लड़के अक्सर अपनी प्रेमिका में एक ऐसे साथी को चाहते हैं जो उसकी छोटी-छोटी जरुरतों को पूरा कर सके और हर घड़ी उसके साथ रहे . आप अपने हर रूप को उसके सामने कितना साकार कर पाती हैं ये आप पर निर्भर करता है. उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतो को पूरा कर, निराशा के समय में हिम्मत दिलाकर, खुशी के पलों की सहभागी बन आप नारी के हर रूप को साकार कर सकती हैं.